उत्तर-पश्चिमी दिल्‍ली में सघन और व्‍यापक हुआ मज़दूर मांगपत्रक आन्‍दोलन का अभियान

अगले माह की 6 तारीख को दिल्‍ली सचिवालय पहुंचकर मुख्‍यमंत्री केजरीवाल को मज़दूरों की मांगने सौंपने की तारीख करीब आने के साथ-साथ दिल्‍ली का मज़दूर मांगपत्रक आन्‍दोलन भी सघन और व्‍यापक होता जा रहा है। जगह-जगह पोस्‍टर लगाए जा रहे हैं, मज़दूरों से संपर्क किया जा रहा है, जनसभाएं, पर्चा-वितरण आदि पहले की तरह जारी हैं। आज इसी क्रम में उत्तर-पश्चिमी दिल्‍ली मज़दूर यूनियन व स्‍त्री मज़दूर संगठन के कार्यकर्ता बादली रेलवे स्‍टेशन, बादली आद्योगिक क्षेत्र, सेक्‍टर 27, रोहिणी की बस्‍ती पहुंचे।

बाहरी दिल्‍ली के मेट्रो विहार के मज़दूरों के बीच पहुंचा मज़दूर मांगपत्रक आन्‍दोलन

लगभग एक लाख की मज़दूर आबादी वाली मेट्रो विहार की बस्‍ती में अन्‍य सभी गरीब बस्तियों की तरह शिक्षा का निचला स्‍तर, पीने के साफ पानी की कमी, सार्वजनिक शौचालयों की बदतर स्थिति, पन्नियों के दलदल से भरी हुई बजबजाती नालियां, बदबू मारते यहां-वहां पड़े हएु कूड़े के ढेर का साम्राज्‍य कायम है। ऊपर से मकान-मालिकों और दलालों-ठेकेदारों की गुण्‍डागर्दी अलग। यहां रहने वाले लोग लगभग 10 साल पहले दिल्‍ली के विभिन्‍न इलाकों लक्ष्‍मीनगर, शकरपुर, आईटीओ, बापूधाम, बड़ा बाग, पश्चिम विहार, कैम्‍प आदि से उजड़कर आये हुए परिवार हैं, जो पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्‍यप्रदेश आदि जगहों से विस्‍थापित हुए थे या यूं कहें कि पूंजी की मार से अपने जगह-जमीन से उजड़कर शहर में आकर व्‍यापक मेहनतकश आबादी का हिस्‍सा बन गये।

भोरगढ़ औद्योगिक क्षेत्र पहुंचा दिल्‍ली के मांगपत्रक आन्‍दोलन का जत्‍था

काम के लिए यहां से गुजरती आबादी को देखकर बरबस ही चार्ली-चैपलिन की फिल्‍म ‘मॉडर्न टाइम्‍स’ की याद आ जाती है। ये मज़दूर आबादी इक्‍कसवीं सदी में भी दोहरी गुलामी झेलने को मजबूर है और एक तरफ कारखाना मालिकों की गालियों, डांट-फटकार, घूसे-थप्‍पड़ की मार, तो दूसरी तरफ भोरगढ़ गांव के मकान मालिकों के ऑक्‍टोपसी पंजे के बीच फंसे रहने को मजबूर है। यहां के मकान मालिक मनमाने रेट पर बिजली का भुगतान करते हैं तथा अपने घरों में खोली हुई दुकानों से ही राशन व अन्‍य सामान लेने के लिए मजबूर करते हैं। ऐसा ना करने पर मज़दूरों से मकान खाली करवा लेते हैं। कारखाना मालिक तो उन्‍हें मनमाने तरीके से गुलामों-जानवरों की खटाते ही हैं। दलाल तथा गद्दार ट्रेड यूनियनों की करतूतों से भी यहां की व्‍यापक मज़दूर आबादी निराश-हताश है। इन मज़दूरों के चेहरे पर इस छटपटाहट की शिनाख्‍़त की जा सकती है। बस एक सब्र का बांध है जिसने इनके गुस्‍से को फूटकर धधकते लावे की तरह बहकर बाहर निकलने से रोका हुआ है। आज सुबह जब यूनियन के कार्यकर्ता उनके बीच पहुंचे तो काम पर पहुंचने की जल्‍दी के बावजूद उन्‍होंने साथियों की बात सुनी, पर्चे लिए और अपने नाम व पते नोट कराए।

बाहरी दिल्‍ली की सर्वाधिक उपेक्षित बस्‍ती सेक्‍टर-27, रोहिणी में पहुंचे मांगपत्रक आन्‍दोलन के कार्यकर्ता

सेक्‍टर-27 की बस्‍ती बरसों से सर्वाधिक उपेक्षित बस्तियों में से एक बनी हुई है। ना तो यहां आने-जाने के लिए सड़क है, ना गंदे पानी की निकासी की व्‍यवस्‍था, ना बच्‍चों के खेलने के लिए पार्क, ना पुलिस चौकी, ना परिवहन के नियमित साधन। यहां रहने वाले मजदूर सुबह टैम्‍पों में भरकर मायापुरी, नारायणा आदि के कारखानों में काम करने जाते हैं, तो कुछ बादली, शाहाबाद डेयरी, बवाना, नरेला, होलंबी कला के उद्योगों में काम करने जाते हैं या आसपास के इलाकों में बेलदारी, पल्‍लेदारी आदि का काम करते हैं। उन्‍होंने इस बात की ताईद की कि किसी भी कारखाने में श्रम कानून लागू नहीं होते और उनके साथ जानवरों जैसा बर्ताव किया जाता है। महिलाओं को तो दोहरी मार झेलनी पड़ती है। उनके लिए कोई सुविधा नहीं होती। लेकिन जिंदा रहने के लिए और अपने बच्‍चे पालने के लिए उन्‍हें यह सब झेलना पड़ता है।

होलंबी कलां रेलवे स्‍टेशन पर दस्‍तक दी दिल्‍ली मांगपत्रक आन्‍दोलन ने

आज जब होलंबी कला का रेलवे स्‍टेशन कोहरे से ढका हुआ था और सैकड़ो मज़दूर वहां आ-जा रहे थे, उसी समय उत्‍तर-पश्चिमी दिल्‍ली मज़दूर यूनियन और स्‍त्री मज़दूर संगठन के कार्यकर्ताओं ने वहां पहुंच कर जोरदार नारे लगाने शुरू किए। देखते ही देखते स्‍त्री-पुरुष मजदूरों ने उन्‍हें चारों ओर से घेर लिया। फिर यूनियन के साथियों ने वहां भाषण देकर उन्‍हें दिल्‍ली मांगपत्रक अभियान के बारे में बताया और 6 फरवरी को दिल्‍ली सचिवालय पर दस्‍तक देने का आह्वान करने वाले पर्चे बांटे और उनके नाम-पते नोट किए व समस्‍याएं सुनीं।
यूनियन के साथियों ने कहा कि पहली बार दिल्ली में किसी सरकार या मुख्यमन्त्री ने मज़दूरों से कुछ ठोस वायदे किये हैं। लेकिन ये सभी वायदे अपने आप पूरे नहीं हो जायेंगे। हम मज़दूरों को हमसे किये गये वायदों की याददिहानी करानी होगी। बिना जन-दबाव के शायद ही दिल्ली सरकार ये वायदे पूरे करे। अगर अब भी हम इन वायदों को पूरा करवाने के लिए एकजुट होकर सरकार पर दबाव नहीं बनाते तो फिर हमारी बदहाली, ग़रीबी और तंगहाली के लिए सिर्फ़ हम जि़म्मेदार होंगे।

शाहाबाद डेयरी और रोहिणी सेक्टर-26 में चला मांगपत्रक अभियान

उत्तरी-पश्चिमी दिल्ली मज़दूर यूनियन और स्त्री मज़दूर संगठन ने ‘मांगपत्रक आन्दोलन’ के तहत रोहिणी के सेक्टर-26 और शाहाबाद डेयरी के बी ब्लॉक में अभियान चलाकर पर्चे बांटे, जनसभाएं की और घर-घर जाकर संपर्क किया। कार्यकर्ताओं ने सभी को मुख्यमंत्री केजरीवाल द्वारा चुनाव से पहले मजदूरों के लिए किए वायदे याद दिलाने के लिए 6 फरवरी को दिल्ली सचिवालय पर इकट्ठा होने का आह्वान किया।
उत्तर-पश्चिमी दिल्ली में 18 और 19 जनवरी को शाहाबाद डेयरी और रोहिणी सेक्टर-26 में चले अभियान के तहत जगह-जगह जनसभाएं करके पर्चा वितरण, जनसंपर्क किया गया। हर जगह गरीब-मजदूर आबादी ने बताया कि उन्हें श्रम कानून के तहत अन्य सुविधाएं तो मिलना दूर रहा, न्यूनतम मज़दूरी तक नहीं मिलती है। इन अभियानों में महिलाओं ने भी 6 फरवरी को दिल्ली सचिवालय पर चलने के लिए अपने नाम लिखवाए और खुद कहा कि जब तक हम मिलकर लड़ेंगे नहीं तब तक हमें अधिकार नहीं मिलने वाले और मालिक लोग हमें कीड़े-मकोड़े से ज्यादा नहीं समझते।

पीरागढ़ी में मज़दूर मांगपत्रक आंदोलन

वैसे तो पीरागढ़ी दिल्ली में जूतों के उत्पादन के लिए मशहूर है। एक्शन, कैम्पस से लेकर छोटी बड़ी सैकड़ों जूतों की व गारमेंट की कम्पनियां हैं जो दिल्ली के खाते पीते वर्ग की ज़रूरतों को पूरा करती हैं। परन्तु इन फैक्टरियों में काम करने वाले लाखों मज़दूरों के साथ बर्बर किस्म का शोषण होता है। ‘आप’ कि राखी बिड़ला खुद मंगोल पूरी क्षेत्र से विधायक हैं पर इन्हे मज़दूरो के उत्पीड़न से कोई फर्क नहीं पड़ता है। 2011 में ही पीरागढ़ी की H-9 फैक्ट्री में सुरक्षा में लापरवाही की वजह से 70 से अधिक मज़दूर जल कर मर गए थे पर प्रशासन मालिक को बचाने में लगा रहा था। यह फिर से दोहराया न जाये इसीलिए उद्योग नगर मज़दूर यूनियन और मंगोलपूरी मज़दूर यूनियन ने मज़दूरों के बीच मज़दूर मांगपत्रक आंदोलन चलाया जिससे कि आने वाली 6 फरवरी को केजरीवाल की सरकार इस बात की गारंटी करे कि पीरागढ़ी के मज़दूर भी अपने हक़ हासिल करें।

उत्‍तर-पश्चिमी दिल्ली में सघन प्रचार व संपर्क अभियान

बवाना, भोरगढ़, नरेला,मेट्रो विहार, होलम्बी कलां, शाहाबाद डेयरी, बादली, राजा विहार, सूरज पार्क,रोहिणी सेक्टर 26-27 आदि इलाकों में आम नागरिकों, गरीब मेहनतकशों-मज़दूरों को रोज़ समस्याओं का सामना करना पड़ता है और उन्हें बुनियादी सुविधाएँ और अपने क़ानूनी श्रम अधिकार तक नहीं मिलते। इस पूरे इलाके में गन्दे पानी की निकासी, शौचालयों की कमी और साफ-सफाई, पार्कों की खस्ता हालत, पानी की सप्लाई, कारख़ानों में मालिकों-ठेकेदारों की लूट और अंधेरगर्दी,सड़कों की ख़राब हालत, स्कूल और डिस्पेंसरी की कमी, महिलाओं से छेड़खानी, गरीबों तक से छीना-झपटी, मारपीट, पुलिस की मनमानी और उत्पीड़न जैसी समस्याएँ रोज़ की बात हैं।

मुस्तफाबाद में मज़दूर मांगपत्रक अभियान

दिल्ली मज़दूर यूनियन और करावल नगर मज़दूर यूनियन ने मुस्तफाबाद में अभियान चलाया। मुस्तफाबाद के घर घर में खुले हुए वर्क शॉपों या दुकानो में हजारो मज़दूरो के लिए श्रम कानून सुनने में अनजाना लगता है। सचिवालय से निकले फैसले इन गलियों को दिल्ली में ढूंढ नहीं पाते हैं। केजरीवाल के मंत्रालय ने मेट्रो मज़दूरो से 13 जनवरी को वायदा किया कि वो दिल्ली में ठेकाकरण ख़त्म करेंगे और सुनिश्चित करेंगे कि मज़दूरो को उनके हक़ मिले। इस हक़ को सुनिश्चित करने के लिए मुस्तफाबाद,खजूरी और करावल नगर के मज़दूर भी अपनी समस्यायों को लेकर 6 फरवरी को केजरीवाल के दफ्तर, दिल्ली सचिवालय चलेंगे।

करावलनगर, खजूरी में मांगपत्रक आंदोलन का आगाज़

करावलनगर, खजूरी में मांगपत्रक आंदोलन का आगाज़  9 और 10 जनवरी को मांगपत्रक आंदोलन करावलनगर और खजूरी के मज़दूरों के बीच  करावलनगर मज़दूर यूनियन और दिल्ली मज़दूर यूनियन के नेतृत्व में चलाया गया। करावल नगर और खजूरी में  लाखों की तादाद में मज़दूर रहते हैं लेकिन यह दिल्ली के वे…

माँगपत्रक आन्दोलन की ओर से दिल्ली के सभी मज़दूरों को इंक़लाबी ललकार!

पहली बार दिल्ली में किसी सरकार या मुख्यमन्त्री ने मज़दूरों से कुछ ठोस वायदे किये हैं। लेकिन ये सभी वायदे अपने आप पूरे नहीं हो जायेंगे। हम मज़दूरों को हमसे किये गये वायदों की याददिहानी करानी होगी। क्योंकि बिना जन-दबाव के शायद ही दिल्ली सरकार ये वायदे पूरे करे। सरकार ये वायदे पूरे करके हम पर कोई अहसान नहीं करेगी, क्योंकि ये तो दशकों पहले पूरे हो जाने चाहिए थे। अगर अब भी हम इन वायदों को पूरा करवाने के लिए एकजुट होकर सरकार पर दबाव नहीं बनाते तो फिर हमारी बदहाली, ग़रीबी और तंगहाली के लिए सिर्फ़ हम जि़म्मेदार होंगे! 6 फरवरी को दिल्ली के लाखों मज़दूर दिल्ली सचिवालय पर इकट्ठा हो रहे हैं। ‘दिल्ली मज़दूर यूनियन’ आह्वान करती है कि आप भी इस आन्दोलन में शामिल हों और इन वायदों पर केजरीवाल सरकार से अमल करवायें!

माँगपत्रक शिक्षणमाला – 12 बाल मज़दूरी और जबरिया मज़दूरी के हर रूप का ख़ात्मा मज़दूर आन्दोलन की एक अहम माँग है

बाल मज़दूरी के मुद्दे को पूरी आबादी के रोज़गार और समान एवं सर्वसुलभ शिक्षा के मूलभूत अधिकार के लिए संघर्ष से अलग करके देखा ही नहीं जा सकता। जो व्यवस्था सभी हाथों को काम देने के बजाय करोड़ों बेरोज़गारों की विशाल फौज में हर रोज़ इज़ाफा कर रही है, जिस व्यवस्था में करोड़ों मेहनतकशों को दिनो-रात खटने के बावज़ूद न्यूनतम मज़दूरी तक नहीं मिलती, उस व्यवस्था के भीतर से लगातार बाल-मज़दूरों की अन्तहीन क़तारें निकलती रहेंगी। उस व्यवस्था पर ही सवाल उठाये बिना बच्चों को बचाना सम्भव नहीं, बाल मज़दूरों की मुक्ति सम्भव नहीं।

माँगपत्रक शिक्षणमाला – 11 स्वतन्त्र दिहाड़ी मज़दूरों से जुड़ी विशेष माँगें

अलग-अलग स्वतन्त्र दिहाड़ी मज़दूरों के लिए न्यूनतम मज़दूरी तय की जाये जो ‘राष्ट्रीय तल-स्तरीय न्यूनतम मज़दूरी’ से ऊपर हो। इनके लिए भी आठ घण्टे के काम का दिन तय हो और उससे ऊपर काम कराने पर दुगनी दर से ओवरटाइम का भुगतान किया जाये। रिक्शेवालों, ठेलेवालों के लिए प्रति किलोमीटर न्यूनतम किराया भाड़ा व ढुलाई दरें तय की जायें तथा जीवन-निर्वाह सूचकांक के अनुसार इनकी प्रतिवर्ष समीक्षा की जाये व पुनर्निर्धारण किया जाये। इसके लिए राज्य सरकारों को आवश्यक श्रम क़ानून बनाने के लिए केन्द्र सरकार की ओर से दिशा-निर्देश जारी किये जायें। दिहाड़ी मज़दूरों से सम्बन्धित नियमों-क़ानूनों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए हर ज़िले में डी.एल.सी. कार्यालय में अलग से पर्याप्त संख्या में निरीक्षक होने चाहिए, जिनकी मदद के लिए निगरानी समितियाँ हों जिनमें दिहाड़ी मज़दूरों के प्रतिनिधि, मज़दूर संगठनों के प्रतिनिधि तथा जनवादी अधिकारों एवं श्रम अधिकारों की हिफाज़त के लिए सक्रिय नागरिक एवं विधिवेत्ता शामिल किये जायें।

माँगपत्रक शिक्षणमाला – 10 ग़ुलामों की तरह खटने वाले घरेलू मज़दूरों को उनकी माँगों पर संगठित करना होगा

देश में इस समय 10 करोड़ लोग घरेलू मज़दूर के तौर पर काम कर रहे हैं। लेकिन यह सिर्फ़ एक अनुमान है क्योंकि इसके बारे में कोई भी ठोस आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं। वास्तविक संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है। इनमें सबसे अधिक संख्या औरतों और बच्चों की है। अन्तरराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन के अनुसार घरेलू मज़दूर वह है जो मज़दूरी के बदले किसी निजी घर में घरेलू काम करता है। लेकिन भारत में इस विशाल आबादी को मज़दूर माना ही नहीं जाता है। ये किसी श्रम क़ानून के दायरे में नहीं आते और बहुत कम मज़दूरी पर सुबह से रात तक, बिना किसी छुट्टी के कमरतोड़ काम में लगे रहते हैं। ऊपर से इन्हें तमाम तरह का उत्पीड़न का भी सामना करना पड़ता है। मारपीट, यातना, यौन उत्पीड़न, खाना न देना, कमरे में बन्द कर देना जैसी घटनायें तो अक्सर सामने आती रहती हैं, लेकिन रोज़-ब-रोज़ इन्हें जो अपमान सहना पड़ता है वह इनके काम का हिस्सा मान लिया गया है। इन्हें कभी भी काम से निकाला जा सकता है और ये अपनी शिकायत कहीं नहीं कर सकते।

माँगपत्रक शिक्षणमाला – 9 (दूसरी किश्त) ग्रामीण व खेतिहर मज़दूरों की प्रमुख माँगें

खेतिहर और ग्रामीण मज़दूर अधिकांश मौकों पर न्यूनतम मज़दूरी से बेहद कम मज़दूरी पर काम करने के लिए मजबूर होते हैं। कई बार उन्हें मिलने वाली मज़दूरी उन्हें ज़िन्दा रखने के लिए भी मुश्किल से ही काफ़ी होती है। खेती के सेक्टर में जारी मन्दी के समय तो उनके लिए हालात और भी भयंकर हो गये हैं। आज देश के अधिकांश कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी खेती में मन्दी के कारण मंझोले और धनी किसानों की दिक्कतों पर तो काफ़ी टेसू बहाते हैं, लेकिन उन खेतिहर और ग्रामीण मज़दूरों के बारे में कम ही शब्द ख़र्च करते हैं, जो तेज़ी और मन्दी दोनों के ही समय में ज्यादातर भुखमरी और कुपोषण में जीते रहते हैं। यह एक त्रासद स्थिति है और भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन में नरोदवाद की गहरी पकड़ की ओर इशारा करता है। बहरहाल, ग्रामीण और खेतिहर मज़दूरों के लिए जो दूसरी सबसे अहम माँग है वह है न्यूनतम मज़दूरी के क़ानून की माँग। अभी ये मज़दूर पूरी तरह बाज़ार की शक्तियों और धनी और मँझोले किसानों के भरोसे होते हैं। वे पूर्णतया अरक्षित हैं और उनके हितों की रक्षा के लिए कोई भी क़ानून मौजूद नहीं है।

माँगपत्रक शिक्षणमाला – 9 (पहली किस्‍त) सर्वहारा आबादी के सबसे बड़े और सबसे ग़रीब हिस्से की माँगों के लिए नये सिरे से व्यवस्थित संघर्ष की ज़रूरत

भारत में सर्वहारा आबादी, यानी ऐसी आबादी जिसके पास अपने बाजुओं के ज़ोर के अलावा कोई सम्पत्ति या पूँजी नहीं है, क़रीब 70 करोड़ है। इस आबादी का भी क़रीब 60 प्रतिशत हिस्सा ग्रामीण सर्वहारा आबादी का है। यानी, गाँवों में खेतिहर और गैर-खेतिहर मज़दूरों की संख्या क़रीब 40 करोड़ है। भारत की मज़दूर आबादी का यह सबसे बड़ा हिस्सा सबसे ज्यादा ग़रीब, सबसे ज्यादा असंगठित, सबसे ज्यादा शोषित, सबसे ज्यादा दमन-उत्पीड़न झेलने वाला और सबसे अशिक्षित हिस्सा है। इस हिस्से को उसकी ठोस माँगों के तहत एकजुट और संगठित किये बिना भारत के मज़दूर अपनी क्रान्तिकारी राजनीति को देश के केन्द्र में स्थापित नहीं कर सकते हैं। सभी पिछड़े पूँजीवादी देशों में, जहाँ आबादी का बड़ा हिस्सा खेती-बारी में लगा होता है और गाँवों में रहता है, वहाँ खेतिहर मज़दूरों को संगठित करने का सवाल ज़रूरी बन जाता है

माँगपत्रक शिक्षणमाला – 8 स्त्री मज़दूर सबसे अधिक शोषित-उत्पीड़ित हैं (दूसरी किस्‍त)

सबसे निचले पायदान पर स्त्री मज़दूर हैं। उन्हें सबसे कम दामों पर, सबसे निचले दर्जे के, कमरतोड़, आँखफोड़ू और ऊबाऊ कामों में लगाया जाता है। मोबाइल फोन के चार्जर, माइक्रोचिप्स, सिले-सिलाये कपड़ों से लेकर गाड़ियों के सी.एन.जी. किट और प्लास्टिक के सामान बनाने वाले उद्योगों तक में औरतें काम कर रही हैं। घण्टों तक खड़े-खड़े कपड़ों की कटिंग, पुर्जों की वेल्डिंग, बेहद छोटे-छोटे पुर्जों की छँटाई, या फिर पूरे-पूरे दिन झुके हुए बैठकर कागज़ की प्लेटों की गिनती, पंखे की जाली की सफ़ाई, पेण्टिंग, पैकिंग, धागा कटिंग, बटन टाँकने, राख में से धातु निकालने जैसे अनगिनत काम बेहद कम दरों पर स्त्री मज़दूरों से कराये जाते हैं। स्त्रियाँ पहले से ही सबसे सस्ती श्रम शक्ति रही हैं जिन्हें जब चाहे धकेलकर बेकारों की रिज़र्व आर्मी में फेंका जा सकता है। आज उनकी स्थिति और भी कमज़ोर हो गयी है।

माँगपत्रक शिक्षणमाला -7 स्त्री मज़दूर सबसे अधिक शोषित-उत्पीड़ित हैं (पहली किश्त)

उद्योगीकरण के अलग-अलग दौरों और पूँजी-संचय की प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों में विभिन्न तरीक़ों से स्त्रियों को उन निकृष्टतम कोटि की उजरती मज़दूरों की कतारों में शामिल किया गया जो सबसे सस्ती दरों और सबसे आसान शर्तों पर अपनी श्रम शक्ति बेच सकती हों, सबसे कठिन हालात में काम कर सकती हों और घरेलू श्रम की ज़िम्मेदारियों के चलते संगठित होकर पूँजीपतियों पर सामूहिक सौदेबाज़ी का दबाव बना पाने की क्षमता जिनमें कम हो।

माँगपत्रक शिक्षणमाला – 6 प्रवासी मज़दूरों की दुरवस्था और उनकी माँगें मज़दूर आन्दोलन के एजेण्डा पर अहम स्थान रखती हैं

काम की तलाश में लगातार नयी जगहों पर भटकते रहने और पूरी ज़िन्दगी अनिश्चितताओं से भरी रहने के कारण प्रवासी मज़दूरों की सौदेबाज़ी करने की ताक़त नगण्य होती है। वे दिहाड़ी, ठेका, कैजुअल या पीसरेट मज़दूर के रूप में सबसे कम मज़दूरी पर काम करते हैं। सामाजिक सुरक्षा का कोई भी क़ानूनी प्रावधान उनके ऊपर लागू नहीं हो पाता। कम ही ऐसा हो पाता है कि लगातार सालभर उन्हें काम मिल सके (कभी-कभी किसी निर्माण परियोजना में साल, दो साल, तीन साल वे लगातार काम करते भी हैं तो उसके बाद बेकार हो जाते हैं)। लम्बी-लम्बी अवधियों तक ‘बेरोज़गारों की आरक्षित सेना’ में शामिल होना या महज पेट भरने के लिए कम से कम मज़दूरी और अपमानजनक शर्तों पर कुछ काम करके अर्द्धबेरोज़गारी में छिपी बेरोज़गारी की स्थिति में दिन बिताना उनकी नियति होती है।

पिछले इक्कीस वर्षों से जारी उदारीकरण-निजीकरण का दौर लगातार मज़दूरी के बढ़ते औपचारिकीकरण, ठेकाकरण, दिहाड़ीकरण, ‘कैजुअलीकरण’ और ‘पीसरेटीकरण’ का दौर रहा है। नियमित/औपचारिक/स्थायी नौकरी वाले मज़दूरों की तादाद घटती चली गयी है, यूनियनों का रहा-सहा आधार भी सिकुड़ गया है। औद्योगिक ग्रामीण मज़दूरों की कुल आबादी का 95 प्रतिशत से भी अधिक असंगठित/अनौपचारिक है, यूनियनों के दायरे के बाहर है (या एक हद तक है भी तो महज़ औपचारिक तौर पर) और उसकी सामूहिक सौदेबाज़ी की ताक़त नगण्य हो गयी है। ऐसे मज़दूरों का बड़ा हिस्सा किसी भी तरह के रोज़गार की तलाश में लगातर यहाँ-वहाँ भागता रहता है। उसका स्थायी निवास या तो है ही नहीं या है भी, तो वह वहाँ से दूर कहीं भी काम करने को बाध्य है। तात्पर्य यह कि नवउदारवाद ने मज़दूरों को ज़्यादा से ज़्यादा यहाँ-वहाँ भटकने के लिए मजबूर करके प्रवासी मज़दूरों की संख्या बहुत अधिक बढ़ा दी है।

हज़ारों मज़दूरों ने दी संसद के दरवाज़े पर पहली दस्तक

दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों, पंजाब, गोरखपुर और छत्तीसगढ़ से आये इन हज़ारों मज़दूरों में भारी संख्या छोटे-बड़े कारख़ानों में काम करने वाले असंगठित मज़दूरों की थी। बड़ी संख्या में स्त्री मज़दूर भी दिल्ली और बाहर से आयी थीं। बाहर से आये मज़दूरों की टोलियाँ सुबह से ही लाल झण्डों और नारों की तख्तियों के साथ रेलवे तथा बस स्टेशनों से जुलूस की शक्ल में जन्तर-मन्तर पहुँचने लगी थीं और देर शाम सभा खत्म होने के बाद रात तक मज़दूरों की टोलियाँ जन्तर-मन्तर की सड़क पर जगह-जगह बैठकें कर आगे के कार्यक्रम पर चर्चा करती रहीं और मज़दूरों के जाने का सिलसिला रात 9 बजे के बाद तक चलता रहा। सुबह से देर रात तक जन्तर-मन्तर के इलाक़े में मज़दूरों के नारों, गीतों और मज़दूर अधिकारों की बातों की गूँज फैली रही। ‘अब चलो नई शुरुआत करो! मज़दूर मुक्ति की बात करो!!’ ‘मेहनतकश जन जागो, अपना हक़ लड़कर माँगो!’ ‘अन्धकार का युग बीतेगा! जो लड़ेगा, वो जीतेगा!!’ ‘मेहनतकश जब भी जागा, इतिहास ने करवट बदली है!’ ‘मज़दूर माँगपत्रक आन्दोलन का नारा! लड़कर लेंगे अपना हक़ सारा!’ जैसे नारे दूर-दूर तक सुनायी देते रहे।

गोरखपुर के मज़दूरों के नाम मुंबई के गोलीबार निवासियों का संदेश

गोलीबार बस्‍ती के आंदोलन की एक नेता प्रेरणा गायकवाड़ ने गोरखपुर के मज़दूरों के नाम अपने संदेश में कहा है, ”हम तो अपनी लड़ाई जीत गए हैं, अब आपको अपनी लड़ाई जारी रखनी है। आप लड़ाई जारी रखें हम आपके साथ हैं।”

गोरखपुर मज़दूर आन्दोलन के दमन के विरोध में कोलकाता में सैकड़ों मज़दूरों का प्रदर्शन

गोरखपुर में मज़दूरों के दमन और उत्तर प्रदेश सरकार की मजदूर विरोधी नीतियों के विरोध में कोलकाता में सैकड़ों मज़दूरों ने प्रदर्शन किया तथा राज्यपाल के माध्यम से मुख्यमंत्री मायावती को ज्ञापन भेजा। श्रमिक संग्राम समिति के बैनर तले कोलकाता इलेक्ट्रिक सप्लाई कारपोरेशन, हिन्दुस्तान इंजीनियरिंग एंड इंडस्ट्रीज लि., भारत बैटरी, कोलकाता जूट मिल, सूरा जूट मिल, अमेरिकन रेफ्रिजरेटर्स कं. सहित विभिन्न कारखानों के 500 से अधिक मज़दूरों ने कल कोलकाता के प्रशासकीय केंद्र एस्प्लेनेड में विरोध प्रदर्शन किया। दिल्ली, पंजाब तथा महाराष्ट्र में भी कुछ संगठन इस मुद्दे को लेकर प्रदर्शन की तैयारी कर रहे हैं।

Demonstration in Kolkata against the repression of workers’ movement in Gorakhpur, activist Sandeep Pandey expresses concern.

Hundreds of workers staged a demonstration in Kolkata against the repression of workers’ movement in Gorakhpur and the anti-labour policies of the Uttar Pradesh government and sent a memorandum to UP Chief Minister Mayawati through the governor. More than 500 workers belonging to various factories including Calcutta Electric Supply Corporation, Hindustan Engineering and Industries Ltd., Bharat Battery, Calcutta Jute Mill, Sura Jute Mill, American Refrigerators co. etc staged a protest demonstration yesterday at Esplanade, the administrative hub of Kolkata, under the banner of Shramik Sangram Samiti. Some organizations from Delhi, Punjab and Maharashtra are also planning protests on this issue.

12 मज़दूर नेता ज़मानत पर रिहा, आन्दोलन और तेज करने का ऐलान

गोरखपुर, 26 मई। पिछले 20 मई को गिरफ्तार किए गए 12 मज़दूर नेता आज ज़मानत पर रिहा कर दिए गए। रिहा होने के बाद संयुक्त मज़दूर अधिकार संघर्ष मोर्चा के तपीश मैन्दोला ने कहा कि मज़दूरों की मांगों को लेकर आन्दोलन अब और तेज किया जाएगा। उन्होंने कहा कि मालिकान की शह पर प्रशासन डरा-धमकाकर और लाठी-गोली-जेल के सहारे मज़दूर आन्दोलन को कुचलने की कोशिश कर रहा है लेकिन वह कामयाब नहीं होगा। मज़दूर अपने मूलभूत अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं और वे अब पीछे नहीं हटेंगे। तपीश ने कहा कि वी.एन. डायर्स में जबरन तालाबन्दी करके और अंकुर उद्योग में मज़दूरों पर गोलियां चलवाकर मालिकों ने यह लड़ाई मज़दूरों पर थोपी है। मगर प्रशासन मालिकों के सुर में सुर मिलाकर उल्टा हमें ही अराजक और विकास-विरोधी बता रहा है।

The 12 labour leaders of the Gorakhpur workers movement released on bail. Struggle to be intensified.

Gorakhpur, 27th of May. The 12 labour leaders of the Gorakhpur workers movement who were arrested on May 20 have been released on bail today. After getting released Tapish Maindola of the Joint Workers Rights Struggle Front said that the agitation for the demands of workers would now be intensified further. He said that at the behest of the factory owners, administration is threatening and intimidating the workers and it is trying to crush the labour movement through bullets, canes and jail but it would not succeed. The workers are fighting for their basic rights and now they would not backtrack. Tapish also said that the factory owners have imposed this fight on the workers by forcefully locking out the V.N. Dyers Mills and by firing on workers in Ankur Udyog Ltd. But the administration is speaking the language of the owners and terming us as anarchists and anti-development.

मायावती सरकार के मज़दूर विरोधी रवैये की देशभर में कड़ी निन्‍दा

संयुक्त मजदूर अधिकार संघर्ष मोर्चा ने पिछले दो दिनों से गोरखपुर के दोनों औद्योगिक क्षेत्रों, कार्यालयों और शहर के प्रमुख स्थानों पर नुक्कड़ सभाओं तथा रिहायशी इलाकों में जनसम्पर्क के जरिए उद्योगपतियों तथा प्रशासन की मिलीभगत का भंडाफोड़ करने और मजदूरों की मांगों के पक्ष में जनसमर्थन जुटाने का अभियान और तेज कर दिया है। अभियान के दौरान बड़े पैमाने पर बांटे गए पर्चे में कहा गया है कि पिछले तीन सप्ताह से हम मज़दूरों के साथ जो कुछ हो रहा है उसने गोरखपुर के प्रशासन का मज़दूर-विरोधी चेहरा एकदम नंगा कर दिया है और देश के लोकतंत्र की असली तस्वीर भी हमारे सामने उजागर कर दी है। पिछली तीन मई को मज़दूरों पर गोलियाँ बरसाये जाने के बाद से ही मज़दूर अपने हक और इंसाफ की माँग के लिए धीरज और शान्ति के साथ सत्याग्रह कर रहे हैं, लेकिन न्याय के बजाय उन्हें मिली हैं गालियाँ, लाठियाँ और जेल। पुलिस-प्रशासन सारे कानूनों को जूते की नोक पर रखकर उनकी सेवा में लगा हुआ है। अपराधी सीना ताने घूम रहे हैं और कानून लागू करने की माँग करने वाले जेल में ठूँस दिये गये हैं। मोर्चा ने मजदूरों-कर्मचारियों, छात्रों-नौजवानों, बुध्दिजीवियों तथा आम नागरिकों से सहयोग की अपील की है।

Workers intensify their campaign among workers-peasants, students-youths, employees and common citizens in and around Gorakhpur

The Joint Workers Rights Struggle Front has speeded up the campaign to gather mass support for exposing the industrialists-administration nexus and in favour of the demands of workers which was started two days ago through street meetings in the two industrial areas of Gorakhpur, offices and the main spots of the cities and door-to-door campaigning in the residential areas. The pamphlets distributed on large scale during the campaign say that whatever the workers have gone through in the past three weeks has thoroughly exposed the anti-worker face of the Gorakhpur administration and it has shown the true picture of the democracy in our country. Right from the May 3 firing incident, the workers have peacefully and patiently continued their ‘Satyagraha’ for their just demands but instead of justice they have only got canes, abuses and jail. The police and administration are blatantly serving the factory owners by keeping the law at bay. The criminals are roaming fearlessly and those who demand the implementation of the laws have been pushed behind bars. The Front has appealed to the workers-employees, students-youth, intellectuals and common citizens to help and cooperate with their struggle.

राष्‍ट्रीय-अंतराष्‍ट्रीय स्‍तर पर गोरखपुर मजदूर आंदोलन के दमन की निंदा, मायावती के नाम ऑनलाइन अपील जारी की

गोरखपुर में 3 मई के गोलीकांड के दोषियों की गिरफ्तारी और अन्‍य मांगों को लेकर 16 मई से भूख हड़ताल पर बैठे मजदूर 20 मई को जिलाधिकारी कार्यालय ज्ञापन देने जा रहे थे तो पुलिस ने उन पर बर्बर लाठीचार्ज करके 73 मजदूरों को हिरासत में लिया था जिनमें से अधिकांश मजदूर देर रात छोड़ दिए गए थे लेकिन बीएचयू की छात्रा श्‍वेता, स्‍त्री मजदूर सुशीला देवी और अन्‍य 12 को गिरफ्तार कर लिया गया था। पुलिस 20 तारीख को दिन में ही मजदूर नेता तपीश मैंदोला को किसी अन्‍य स्‍थान से उठा ले गई थी और अगले दिन कोर्ट में उनकी पेशी से पहले तक तपिश की गिरफ्तारी से इंकार करती रही। बाद में दोपहर को अचानक तपिश को मजिस्‍ट्रेट के सामने पेश कर दिया गया। सभी मजदूर नेताओं पर पुलिस ने तीन-तीन फर्जी मुकदमे दायर किए हैं। जेल भेजे गए सभी 14 मजदूर नेताओं ने जेल में आमरण-अनशन शुरू कर दिया है। इनमें से श्‍वेता और सुशीला देवी पिछले 6 दिन से आमरण अनशन पर हैं जिसके कारण उनकी हालत लगातार बिगड़ रही है। इसके बावजूद उन्‍होंने जेल में भी आमरण अनशन शुरू कर दिया है। दो मुकदमों में दोनों को जमानत मिलने के बावजूद पुलिस द्वारा दायर किए गए तीसरे मुकदमे में उन्‍हें जमानत नहीं मिली थी।

14 मजदूर नेताओं ने जेल में आमरण अनशन जारी रखा

मजदूरों या उनके प्रतिनिधियों को सूचना दिए बिना ही निपटा ली गई एकतरफा वार्ता निकाले गए 18 मजदूरों को काम पर वापस रखने की मजदूरों की मुख्‍य मांग पर चर्चा तक नहीं हुई  फैक्‍ट फाइंडिंग टीम की जांच पूरी, प्रथम दृष्‍टया प्रशासन की भूमिका को नकारात्‍मक बताया नई दिल्‍ली, 22…