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दिल्ली की जनता से किये गये वायदों को पूरा करने में नाकाम केजरीवाल सरकार कुर्सी छोड़कर भागी
यह ‘कुरबानी’ नहीं, धोखा और नौटंकी है!

साथियो!

Kejriwal_PTIकेजरीवाल सरकार को आख़िरकार सिर पर रखा काँटे का ताज उतारने का मौका मिल ही गया! 14 फरवरी को ‘आम आदमी पार्टी’ सरकार के मुख्यमन्त्री अरविन्द केजरीवाल ने यह कहकर इस्तीफ़ा दे दिया कि कांग्रेस और भाजपा ने जनलोकपाल बिल पास नहीं होने दिया। हम जानते हैं कि सिर से पाँव तक भ्रष्टाचार में डूबी कांग्रेस-भाजपा भी अरविन्द केजरीवाल से जनलोकपाल बिल के लिए उपराज्यपाल से सहमति की औपचारिकता को पूरा करने के लिए कह रही थीं। केजरीवाल जानते थे कि अन्ततः इस बिल को सहमति देना केन्द्र की कांग्रेस सरकार की मजबूरी है! वैसे तो जनलोकपाल कानून पास हो जाने पर भी भ्रष्टाचार समाप्त नहीं हो जाता व इसे लेकर कांग्रेस, भाजपा और आप के बीच जो चल रहा था, वह एक नौटंकी ही था। लेकिन नौटंकी के भी कुछ नियम होते हैं!! अरविन्द केजरीवाल मुख्यमन्त्री बनने से पहले भी जानते थे कि 1991 के कानून के अनुसार दिल्ली में कोई भी नया कानून पास कराने के लिए उन्हें इसी रास्ते से गुज़रना होगा। लेकिन जानबूझकर एक नकली राजनीतिक संकट पैदा कर भागने को बेताब आम आदमी पार्टी ने अपनी सरकार गिरा ली! सरकार से भागने की केजरीवाल को इतनी जल्दी क्यों थी? इसके कई कारण हैं।

पहला कारण, दिल्ली के असंगठित मज़दूर केजरीवाल सरकार पर वायदा पूरा करने के लिए लगातार दबाव बना रहे थे। केजरीवाल सरकार के श्रममन्त्री गिरीश सोनी (जो कि खुद एक कारखाना-मालिक है!) ने 6 फरवरी को दिल्ली के हज़ारों मज़दूरों के सामने ‘‘ठेका मज़दूरी उन्मूलन क़ानून’’ लाने से साफ़ इंक़ार कर दिया और मज़दूरों के प्रतिनिधियों से कहा कि उन्हें ठेकेदारों-मालिकों के हितों को भी देखना है! डीटीसी ठेका कर्मचारियों ने भाषण देने आये अरविन्द केजरीवाल को दौड़ा लिया; हज़ारों ठेका शिक्षकों ने कई दिनों तक सचिवालय को घेरे रखा और अन्त में केजरीवाल सरकार ने ज़बरन उन्हें सचिवालय से हटाया! केजरीवाल सरकार ने न्यूनतम मज़दूरी व अन्य श्रम कानूनों को लागू करवाने के लिए श्रम विभाग में भ्रष्टाचार ख़त्म कर कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने के वायदे पर अमल के लिए 49 दिनों में एक कदम भी नहीं उठाया। वहीं ठेका प्रथा के खत्म करने के लिए बनाई गई ‘कमेटी’ धोखाधड़ी है क्योंकि आज तक न तो कमेटी के सदस्य घोषित है और न ही कमेटी की कोई बैठक बुलाई गई। ‘आप’ को दिल्ली के ठेकेदारों-मालिकों-दलालों आदि का समर्थन यूँ ही नहीं मिल रहा! ‘आप’ सरकार का श्रममन्त्री स्वयं मज़दूरों का शोषण करने वाला एक कारखाना मालिक है! यह तो वही बात हुई कि कुत्ते को मांस के प्लेट की रखवाली का काम दे दिया जाय! केजरीवाल सरकार ने दिल्ली के लाखों असंगठित मज़दूरों-कर्मचारियों से धोखाधड़ी की। ये मज़दूर 6 फरवरी को विशाल तादाद में केजरीवाल सरकार को घेरने के बाद 24 मार्च को ‘मज़दूर महापंचायत’ कर केजरीवाल सरकार को घेरने का एलान कर चुके थे। लोकसभा चुनावों के पहले ऐसे मज़दूर आन्दोलन से आम आदमी पार्टी को नुकसान पहुँचा सकता था, और इसलिए केजरीवाल उससे पहले ही शहादत का नकली चोगा पहनकर भागने का कोई बहाना ढूँढ रहे थे।

दूसरा कारण यह था कि लोकसभा चुनावों के पहले काँटेदार कुर्सी छोड़कर सड़क पर विरोध की नौटंकी करने का फायदा ज़्यादा था! केजरीवाल व योगेन्द्र यादव-जैसों को पता था कि जितने दिन सरकार चलेगी, आम आदमी पार्टी उतनी ही नंगी होती जायेगी और जल्द ही उसकी भी हालत कांग्रेस, भाजपा व अन्य चुनावी दलों जैसी ही हो जायेगी! इसलिए लोकसभा चुनाव के पहले ही सरकार कुरबान करने और “शहीद” हो जाने का स्वाँग रचो और फिर जनता के बीच अपनी पुरानी नौटंकी चालू करो! आम आदमी पार्टी की पूरी योजना यही थी।

तीसरा कारण यह था कि केजरीवाल ने पानी और बिजली के सवाल पर दिल्ली की जनता से जो धोखा किया था वह अब लोगों के सामने आने लगा था। केजरीवाल ने कच्ची व झुग्गी बस्तियों में घूम-घूमकर कहा था कि उन्हें पानी-टैंकर माफ़िया से मुक्ति मिलेगी व हर घर को 700 लीटर मुफ्त पानी दिया जायेगा। केजरीवाल सरकार ने सफ़ेद झूठ बोलते हुए पोस्टर भी लगवा दिये कि उसने हर घर को 700 लीटर पानी पहुँचाया है! सच्चाई यह है कि जो लोग पानी टैंकर माफ़िया से परेशान हैं, उन्हें कोई मुफ्त पानी नहीं मिला! क्योंकि केजरीवाल ने सिर्फ़ दिल्ली के खाते-पीते मध्यवर्ग तक को ही 667 लीटर मुफ्त पानी दिया, क्योंकि यह सिर्फ़ मीटर्ड कनेक्शन वालों को मिला! बिजली के बिल को आधा करने का वायदा भी केजरीवाल ने वास्तव में पूरा नहीं किया। बिल पर पहले से 25 प्रतिशत सब्सिडी मिल रही थी। केजरीवाल सरकार ने ऊपर से लगभग 25 प्रतिशत सब्सिडी देकर दावा किया कि उसने पूरी 50 प्रतिशत सब्सिडी दी है (जो की असल में जनता से जुटाया गया पैसा है और अम्बानी की जेब में डाला जा रहा है)! जबकि चुनाव के पहले आम आदमी पार्टी ने यह भी नहीं बताया था कि 400 यूनिट से ऊपर कोई सब्सिडी नहीं मिलेगी। केजरीवाल सरकार ने 50 प्रतिशत सब्सिडी को जारी रखने के लिए यह शर्त भी लगा दी कि बिजली कम्पनियों के ऑडिट पूरे होने के बाद इस सब्सिडी को जारी रखने या न रखने पर फैसला लिया जायेगा! जनता धीरे-धीरे केजरीवाल सरकार की असलियत समझ रही थी। लेकिन पूरी तरह नंगा होने से पहले केजरीवाल सरकार भागना चाहती थी ताकि बाद में कह सके उसे वक़्त नहीं मिला व उसे काम नहीं करने दिया गया!

चौथा कारण-दिल्ली की जनता देख रही थी कि शीला दीक्षित के ख़िलाफ़ केजरीवाल ने कोई प्राथमिकी दर्ज़ नहीं की। चुनाव से पहले केजरीवाल ने ही 370 पेज की रपट तैयार की थी और सरकार से माँग की थी कि एक सप्ताह के भीतर शीला दीक्षित के ख़िलाफ़ प्राथमिकी दर्ज़ करायी जाय। लेकिन कांग्रेस के ख़िलाफ़ दिखावटी बयानबाज़ी करने के बावजूद केजरीवाल सरकार ने यह वास्तविक कदम नहीं उठाया! केजरीवाल सरकार ने इस्तीफ़े से ठीक पहले वीरप्पा मोइली, मुकेश अम्बानी आदि के ख़िलाफ़ एफ़.आई.आर. की लेकिन सिर्फ़ इसलिए क्योंकि तुरन्त ही सरकार को गिरा देना था! जब एफ़.आई.आर. करने वाला ही नहीं रहा तो इस पर कार्रवाई की सुध कौन लेगा? एफ़.आई.आर. का फ़ायदा ? वास्तव में केजरीवाल ने लोकसभा चुनावों की ख़ातिर लोकप्रियता के लिए यह एफ़.आई.आर. की मीडिया नौटंकी रची थी क्योंकि एफ़.आई.आर. पर कभी कार्रवाई करने का इरादा था ही नहीं!

पाँचवा कारण यह था कि केजरीवाल सरकार के उद्धत मन्त्रियों की हरक़तों से दिल्ली की जनता इन नकली ‘रखवालों’ की असलियत को समझने लगी थी! जैसे कि राखी बिड़लान (जिसने एक बच्चे की बॉल कार पर लगने पर प्राथमिकी दर्ज़ करा दी कि उस पर हमला किया गया!), सोमनाथ भारती (जिसने निर्दोष महिलाओं पर वेश्यावृत्ति व ड्रग्स का आरोप लगाकर उन्हें सरेआम अपमानित किया और नस्लभेदी टिप्पणी की!), मनीष सिसोदिया (जिसने दिल्ली के कॉलेजों में दिल्ली के स्कूलों से बारहवीं करने वालों के लिए आरक्षण करने को कहा!), स्वयं अरविन्द केजरीवाल (जिनके तमाम झूठ पकड़े गये जैसे कि उन्हें ज़बरन सरकारी बंगला दिया गया जबकि मुख्यमन्त्री बनने के अगले ही दिन केजरीवाल ने उपराज्यपाल को पत्र लिख बंगलों की माँग की थी!)।

साथियो! केजरीवाल सरकार शुरू से ही सरकार गिर जाने का मौका तलाश रही थी क्योंकि ‘केजरीवाल एण्ड पार्टी’ को पता था कि सरकार बनते ही असलियत उजागर हो जायेगी! इस्तीफ़ा-नौटंकी के बाद अब केजरीवाल ‘कुरबानी और शहादत’ का मीडिया ड्रामा करेंगे और जनता को मूर्ख बनाने का प्रयास करेंगे। हमें समझने की ज़रूरत है कि केजरीवाल की ‘आप’ और कांग्रेस, भाजपा व अन्य चुनावी पार्टियों में कोई अन्तर नहीं है। जब भी पूरी व्यवस्था और उसे चलाने वाली तमाम लुटेरी चुनावी पार्टियाँ बिल्कुल नंगी हो जाती हैं, तो व्यवस्था को किसी ‘श्रीमान सुथरा’ की ज़रूरत होती है। पहले इस ज़रूरत को मोरारजी देसाई सरकार ने पूरा किया था। आज इस ज़रूरत को ‘केजरीवाल एण्ड पार्टी’ पूरा कर रही है। ऐसा न हो तो जनता व्यवस्था की चौहद्दियों को तोड़ने और बग़ावत व इंक़लाब के बारे में सोच सकती है! इसलिए लुटेरी व्यवस्था को कोई ऐसा नौटंकीबाज़ चाहिए होता है जो अपने आपको ‘ईमानदारी का बुत’ बताये, कुछ गर्म बातें व कुछ प्रतीकात्मक हरक़तें करे, सेफ्टीवॉल्व (केजरीवॉल्व?!) के समान जनता के गुस्से को कारपोरेट मीडिया की सीटी बजा-बजाकर निकाल दे व व्यवस्था के प्रेशर कुकर को फटने से बचा ले! कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा, माकपा, भाकपा, जदयू आदि जैसी खुली लुटेरी पार्टियाँ सामने फन काढ़े नाग के समान हैं, लेकिन ‘आम आदमी पार्टी’ घास में छिपे ज़हरीले साँप के समान है। बेहतर है कि हम डसे जाने से पहले समझ लें और अपना इंक़लाबी विकल्प खड़ा करने का काम शुरू करें!

भगतसिंह का ख्वाब़ इलेक्शन नहीं, इंक़लाब!!

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