मज़दूर माँगपत्रक आन्दोलन की ओर से दिल्ली के सभी मज़दूरों को इंक़लाबी ललकार
‘आम आदमी’ के ‘अच्छे दिनों’ की असलियत पहचानो!
‘दिल्ली मज़दूर महापंचायत’ में हज़ारों-हज़ार की संख्या में शामिल हो!!
दिल्ली के सभी मज़दूर-मेहनतकश भाइयो, बहनो और साथियो!
पिछले दो सालों में दिल्ली की मज़दूर और ग़रीब आबादी को दो शब्दों ने बहुत बेवकूफ बनाया है-‘अच्छे दिन’ और ‘आम आदमी’! ‘अच्छे दिनों’ और ‘आम आदमी’ का मंत्र जपने वाले देश के प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने इन दो सालों में दिल्ली के मेहनतकशों के साथ ऐसा बर्ताव किया है जैसा सड़क चलते बटमार और उठाईगीरे भी नहीं करते। ये दोनों ही सरकारें आम मेहनतकशों के हक़-अधिकार एक-एक करके छीन रही हैं। साथ ही लोगों को उल्लू बनाने के लिए आपस में झगड़े की नौटंकी भी खूब कर रही हैं। लेकिन, सच तो यह है कि मोदी और केजरीवाल एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।फर्क बस इतना है कि जो काम मोदी पूँजीपतियों और कॉरपोरेट घरानों के लिए डंके की चोट पर करता है वही काम केजरीवाल थोड़ा छुप-छुपाकर करता है। लेकिन, हम मज़दूरों के प्रति इनके रवैये में कोई फर्क नहीं है।
मई 2014 में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद से मज़दूरों के अधिकारों पर लगातार हमले जारी हैं। गद्दी सँभालते ही मोदी ने पूँजीपतियों के वफादार की भूमिका निभायी है जिन्होंने उसके चुनाव प्रचार पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाये थे।अपने आकाओं को खुश करने के लिए मोदी सरकार ने आते ही रहे-सहे श्रम कानूनों की भी धज्जियाँ उड़ा डाली हैं। ‘विकास-विकास’ की रट लगाने वाले नरेन्द्र मोदी के विकास का अर्थ हैः पूँजीपतियों का बेरोक-टोक ज़बरदस्त मुनाफा और अमीरजादों के लिए चमचमाते शॉपिंग मॉल, 8-लेन एक्सप्रेस हाईवे, बुलेट ट्रेन। जबकि मज़दूरों के लिए इसका मतलब है “देश और राष्ट्र के विकास” के लिए 15-15 घण्टे कारखाने और वर्कशॉपों में बिना न्यूनतम मज़दूरी के चुपचाप हाड़ गलाना! ‘मेक इन इण्डिया’ और ‘स्टार्ट अप इण्डिया’ जैसे खोखले नारों की सच्चाई है-पूँजीपतियों और कारखानेदारों को मज़दूरों के माँस को मण्डी में खुलकर बेचने की आज़ादी देना। जो इसके खि़लाफ आवाज़ उठायेगा वह देश का दुश्मन कहलायेगा। देशभक्ति को ‘सरकार-भक्ति’ बना दिया गया है। यही कारण है कि जहाँ एक ओर मज़दूरों, स्त्रिायों, दलितों, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों का बर्बर दमन किया जा रहा है वहीं दूसरी ओर हर किस्म के राजनीतिक विरोध की आवाज़ को कुचलने का काम भी अंजाम दिया जा रहा है। मोदी सरकार के “अच्छे दिनों” का सच यही है!
दूसरी तरफ, दिल्ली में जबसे केजरीवाल की सरकार बनी है तबसे दिल्ली के मेहनतकशों का हाल बेहाल है। पिछले एक साल में कई बार झुग्गियाँ उजाड़ी गयी हैं। आँगनवाड़ी की महिलाओं से लेकर एम.सी.डी. के सपफाईकर्मियों तक, गेस्ट टीचरों से लेकर ठेका कर्मियों तक-सभी अपनी माँगों को लेकर सड़कों पर हैं। केजरीवाल के पास इन सबका बकाया वेतन भुगतान करने का पैसा नहीं है! लेकिन, आते ही उसने अपने विधायकों का वेतन 2 लाख 35 हजार कर दिया और अपने सरकारी प्रचार पर 526 करोड़ रुपये उड़ा दिये! भ्रष्टाचार का सफाया करने आये ‘श्रीमान सुथरा जी’ के 23 विधायकों के खि़लाफ़ आपराधिक मामले दर्ज हैं! बात-बात पर ‘आम आदमी’ का दम भरने वाली केजरीवाल सरकार के 44 विधायक करोड़पति हैं जिनमें से ज़्यादातर कारखानेदार या व्यापारी हैं। अपनी फैक्ट्री-कारखानों में ये श्रम कानूनों का कितना पालन करते हैं यह बताने की ज़रूरत नहीं है। केजरीवाल सरकार का असली मज़दूर-विरोधी चेहरा तब सामने आया जब पिछले साल 25 मार्च को दिल्ली सचिवालय पर अपनी माँगों के साथ आये मज़दूरों पर उसने बर्बर लाठीचार्ज करवाया। दिल्ली में ठेकेदारी प्रथा खत्म करने, झुग्गीवासियों को पक्के मकान देने, आठ लाख नौकरियाँ देने जैसे वायदों पर केजरीवाल एकदम चुप हैं। छोटे पूँजीपतियों, कारखानेदारों, व्यापारियों की नुमाइन्दगी करने वाले केजरीवाल के ‘आम आदमी’ ये ही परजीवी जोंकें हैं।
वहीं ‘चुनाव-चुनाव’ के इस खेल में जो तीसरी पार्टी काँग्रेस है वह कुछ समय के लिए हाशिये पर लग रही है। लेकिन भूलना नहीं चाहिए की इन घोर मज़दूर विरोधी नीतियों की शुरुआत 1990-91 में काँग्रेस ने ही की थी। असल में भाजपा, काँग्रेस, आप और संसदीय वाम का झगड़ा सिर्फ इस बात का है कि अगले पाँच साल तक जनता को लूटने का ठेका कौन लेगा!
ऐसे समय में मज़दूरों पर बढ़ते हमलों को रोकने के लिए केंद्रीय ट्रेड यूनियनें बीच-बीच में विरोध की नौटंकी करती हैं। बैंक, बीमा, बिजली, कोयला, स्टील जैसे अहम सेक्टर इन चुनावी ट्रेड यूनियनों के हाथ में है। ये चाहें तो हफ्ते भर लम्बी हड़ताल करके पूँजीवाद का चक्का जाम कर सकती हैं। लेकिन, ये ऐसा नहीं करती हैं। हाँ, इतना ज़रूर है कि ये मज़दूर वर्ग के इकठ्ठा हुए गुस्से को प्रेशर कुकर में लगी सीटी की तरह एक दिवसीय हड़ताल की रस्म निभाकर बाहर निकालती रहती हैं। यदि ये ऐसा न करें तो हालात विस्फोटक हो सकते हैं। ये दलाल ट्रेड यूनियनें पूँजीवादी व्यवस्था की सुरक्षा पंक्ति का ही काम करती हैं।
साथियो! इसलिए अपने संघर्ष का बीड़ा हमें खुद उठाना होगा। मोदी सरकार और केजरीवाल सरकार को चेतावनी देनी होगी कि वे दिल्ली के मज़दूरों-मेहनतकशों की अनदेखी नहीं कर सकते। ये दिल्ली हमारे मेहनती हाथों ने बनायी है और यहाँ की समस्त समृद्धि हमारी ही पैदावार है। इसलिए हम माँग करते हैं किः
मोदी सरकार के समक्ष दिल्ली के मज़दूरों का माँगपत्रकः
1. श्रम कानूनों में किये जा रहे मज़दूर-विरोधी संशोधनों को तत्काल रोका जाये। सभी श्रम कानूनों को प्रभावी तरीके से लागू किया जाय।
2. न्यूनतम मज़दूरी ज़रूरतों के आधर पर तय की जाय। मौजूदा जीवन-निर्वाह स्तर और महँगाई की दर के हिसाब से सभी मज़दूरों के लिए न्यूनतम मज़दूरी 15 हजार रुपये प्रति माह तय किया जाय।
3. निजी और सरकारी क्षेत्र में श्रम के ठेकाकरण की पूर्ण समाप्ति की जाय। चूँकि ‘ठेका मज़दूर (विनियमन और उन्मूलन) कानून 1970’ एक कमजोर कानून है इसलिए एक नया प्रभावी ‘ठेका प्रथा उन्मूलन कानून’ बनाया जाय।
4. ‘मनरेगा’ की तर्ज पर ‘राष्ट्रीय शहरी रोज़गार गारण्टी कानून’ पारित किया जाय जो साल में 200 दिनों के रोज़गार की गारण्टी देता हो। रोज़गार न मिलने की सूरत में रु. 5000 प्रति माह बेरोजगारी भत्ता दिया जाय।
5. एक ही तरह के काम के लिए पुरुष और स्त्री मज़दूरों की मज़दूरी में ग़ैरबराबरी ख़त्म की जाय। इसके लिए ‘समान मज़दूरी कानून 1976’ को सख्ती से लागू किया जाय। कार्यस्थलों पर स्त्री कामगारों के साथ होनेवाली छेड़छाड़, बदसलूकी जैसे मामलों में दण्ड के प्रावधनों को कठोर एवं प्रभावी बनाया जाय।
6. लेबर चौक के मज़दूरों, रिक्शा चालकों, रेहड़ी खोमचा लगानेवाले सभी स्वतंत्र दिहाड़ी मज़दूरों का पंजीकरण केन्द्रीय श्रम मंत्रालय द्वारा शीघ्र किया जाय। इन्हें श्रम कानूनों के दायरे के भीतर लाया जाय।
7. सभी घरेलू कामगारों के लिए महाराष्ट्र की तर्ज़ पर ‘घरेलू कामगार कानून’ बनाया जाय।
8. असंगठित क्षेत्र के सभी मज़दूरों के लिए ‘असंगठित क्षेत्र सामाजिक सुरक्षा कानून, 2008’ तत्काल लागू किया जाय।
9. सभी मज़दूरों विशेषकर असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों की ट्रेड यूनियन बनाने की प्रक्रिया सरल एवं पारदर्शी बनायी जाय।
10. श्रम विभाग में भ्रष्टाचार और दलाली पर रोक लगाने के लिए निगरानी समितियों का गठन किया जाय जिनमें मज़दूरों के प्रतिनिधि नियोक्ताओं के प्रतिनिधि श्रम विभाग के प्रतिनिधि के अलावा श्रम कानून विशेषज्ञ और नागरिक अधिकार आन्दोलन के प्रतिनिधि भी शामिल हों।
केजरीवाल सरकार के समक्ष दिल्ली के मज़दूरों का माँगपत्रकः
1. नियमित प्रकृति के सभी कार्यों से ठेका प्रथा के तत्काल उन्मूलन के लिए ‘दिल्ली राज्य ठेका प्रथा उन्मूलन विधेयक’ तत्काल पारित किया जाय जो निजी व सार्वजनिक क्षेत्र में नियमित प्रकृति के कार्य पर ठेका मज़दूर रखने पर सख़्त व तत्काल पाबन्दी लगाता हो।
2. ‘मनरेगा’ की तर्ज़ पर ‘दिल्ली शहरी रोज़गार गारण्टी विधेयक’ तत्काल पारित किया जाय जो साल में कम-से-कम 200 दिनों के रोज़गार की गारण्टी देता हो और रोज़गार न दे पाने की सूरत में रु. 5000 प्रति माह बेरोज़गारी भत्ता दे।
3. सभी श्रम कानूनों को सख़्ती से लागू करवाया जाये, जैसे कि पहचान कार्ड, न्यूनतम मज़दूरी, ई.एस.आई., पी.एफ, आदि।
4. श्रम विभाग श्रम कानूनों का कार्यान्वयन करवा सके इसके लिए श्रम विभाग में नयी रिक्तियाँ निकालकर लेबर व फैक्टरी इंस्पेक्टरों की संख्या तत्काल बढ़ायें।
5. झुग्गियों के तोड़े जाने पर तत्काल रोक के साथ पक्के मकान देने की एक समयबद्ध योजना बतायी जाय। पक्के मकान नहीं मिलने तक पानी, बिजली, साफ़-सफ़ाई व पक्की सड़कों/खड़ंजों की व्यवस्था सुनिश्चित की जाय।
6. भ्रष्टाचार-रोधी हेल्पलाइन की तर्ज़ पर एक मज़दूर हेल्पलाइन मुहैया करायी जाय।
7. स्त्री-मज़दूरों के लिए समान कार्य के लिए समान वेतन को सुनिश्चित किया जाय और साथ ही कार्यस्थलों में स्त्री मज़दूरों के साथ होने वाले यौन उत्पीड़न व छेड़छाड़ के लिए सख़्त दण्डात्मक प्रावधन किये जायें।
8. सभी निर्माण मज़दूरों के लिए सामाजिक सुरक्षा कार्ड त्वरित गति से बनाये जायें। सभी जारी निर्माण कार्य स्थलों पर विशेष शिविर लगाये जायें।
9. दिल्ली के लाखों घरेलू मज़दूरों के लिए महाराष्ट्र राज्य की तर्ज़ पर एक घरेलू कामगार कानून पारित किया जाय।
10. रेहड़ी-पटरी, रिक्शेवालों के लाईसेंस बनाये जायें और उन्हें स्थायी स्थान मुहैया कराया जाय।
साथियो! कोई भी सरकार अपने-आप मज़दूरों की माँगें पूरी नहीं करती है। हमें अपनी फौलादी एकजुटता के दम पर इनसे अपनी माँगों को मनवाना होगा। इसलिए, मज़दूर साथियो! 6 मार्च, 2016 को जब मज़दूरों के संघर्ष के शंखनाद से दिल्ली की सड़कें गूँजेंगीं तो आपको भी वहाँ होना होगा।
दिल्ली मज़दूर यूनियन बिगुल मज़दूर दस्ता