बादली औद्योगिक क्षेत्र और डीटीसी के आंदोलनरत ठेकाकर्मियों के बीच चला मांगपत्रक अभियान
दिल्ली, 28 जनवरी। आज उत्तर-पश्चिमी दिल्ली मज़दूर यूनियन और स्त्री मज़दूर संगठन के कार्यकर्ता मांगपत्रक अभियान बादली औद्योगिक क्षेत्र के गेट नं 4 पर अभियान चलाने पहुंचे तो पता चला कि सेक्टर-18 के डीटीसी बस डिपो के अस्थायी कर्मचारी स्थायी नौकरी देने और अन्य मांगों के लिए चल रहे अपने आंदोलन के तहत वहां से गुजरने वाली डीटीसी बसों के अस्थायी कर्मचारियों को अपने साथ चलने के लिए तैयार कर रहे थे और वहां बड़ी संख्या में मौजूद थे। गेट नं. 4 पर पर्चा-वितरण और जनसंपर्क के बाद डिपो में अभियान चलाया और डीटीसी के ठेका कर्मचारियों के बीच पर्चे बांटे व पोस्टर आदि लगाए।
जब मांगपत्रक आन्दोलन से जुड़े कार्यकर्ता इन ठेका कर्मचारियेां की समस्या सुन रहे थे, और उनकी सलाह पर डिपो में 6 फरवरी के अभियान का पोस्टर लगा रहे थे, तभी सेक्टर-18 के डिपो नं 4 पर कार्यरत ‘आप’ समर्थक डीटीसी अधिकारियों ने उनसे झड़प शुरू कर दी, सुरक्षाकर्मियों को आदेश देकर पोस्टर फड़वा दिए और कहा कि आप लोग भाजपा और कांग्रेस के इशारे पर केजरीवाल व ‘आप’ के खिलाफ कर्मचारियों को भड़का रहे हैं। गौरतलब है कि इसी तरह की बातें कल के शाहाबाद डेयरी अभियान के दौरान भिड़े ‘आप’ समर्थकों ने कही थीं।
एक खबर के अनुसार, डीटीसी में लगभग 14,000 ड्राइवर, कंडक्टर ठेके पर हैं, इसके अलावा बड़ी संख्या में मैकेनिकल स्टाफ पर ठेके पर काम कर रहा है। लेकिन लंबे समय से नौकरी स्थायी करने, अच्छी वर्दी देने, तमाम भत्ते देने आदि मांगों को लेकर अधिकारियों, मंत्रियों से लेकर अनेक दरवाजों पर दस्तक दे चुके हैं, लेकिन स्थिति ज्यों कि त्यों बनी हुई है। इस बार, कल से ही मिलेनियम डिपो, इंद्रपस्थ पर तकरीबन 400 ठेका कर्मचारी धरने पर बैठे हुए हैं और उस धरने में शामिल होने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। इसी की वजह से कई डीटीसी की कई बसें भी सड़क पर नहीं उतरीं।
ये लोग कि.मी. स्कीम बंद करने, तुरंत स्थायी नौकरी देने, सभी कैशलेस स्कीम बंद करने आदि की मांग करते थे तो उन्हें अधिकारी काम से निकालने की धमकी देते थे। डिपों में समय पर पहुंचने के बावजूद 3-4 घंटे तक गाड़ी का इंतज़ार करना पड़ता है, जिसका भुगतान नहीं दिया जाता। भुगतान दिहाड़ी के हिसाब से होता है। श्रम-कानूनों को ताक पर रखा ही जाता है। ज्यादा बोलें तो गैर-कानूनी तरीके से फाइन लगा दिया जाता है। अच्छे रूटों पर ठेका कर्मियों को नहीं भेजा जाता, जबकि ज्यादा मेहनत का काम ठेका कर्मी करते हैं।