मज़दूर संघर्ष संकल्प अभियान
हमें मंज़ूर नहीं कोरोना से मौत! हमें मंज़ूर नहीं बेरोज़गारी-भुखमरी से मौत!
हमें मंज़ूर नहीं ग़ुलामों की तरह खटना!
हमें चाहिए इंसानों जैसी ज़िन्दगी और सम्मान!
हक़ लेने की ठानी है! हार न हमने मानी है!
मेहनतकश भाइयो, बहनो, साथियो!
कोरोना महामारी ने पूरी पूँजीवादी व्यवस्था की नंगी सच्चाई को उजागर करके रख दिया है। एक तरफ़ मज़दूर कोरोना संक्रमण और मौत के जोखिम को झेल रहे हैं। दूसरी तरफ़ घोर मज़दूर-विरोधी मोदी सरकार ने इस संकट में बिना किसी तैयारी और योजना के जो लॉकडाउन थोपा उसमें भी सैकड़ों जानें चली गयीं। जो प्रवासी मज़दूर अपने घरों को लौटना चाहते थे, उनके लिए कोई व्यवस्था नहीं की गयी। नतीजतन, श्रमिक ट्रेनों में कम से कम 80 मज़दूरों और उनके बच्चों की मौत हुई। अब फिर बिना किसी योजना के लॉकडाउन को खोलने के नाम पर हमें कारख़ानों में काम के लिए धकेला जा रहा है, ताकि पूँजीपतियों की मुनाफे़ की महीनों से ठप्प पड़ी मशीनरी चालू हो सके। नतीजतन, देश के दर्जनों कारख़ानों और दफ़्तरों में मज़दूर साथियों को कोरोना संक्रमण हो रहा है, मज़दूर बस्तियों में कोरोना संक्रमण तेज़ी से फैल रहा है और उनकी मौतें हो रही हैं और इनके आँकड़ों को बड़े पैमाने पर छिपाया जा रहा है। हमारे सामने पूँजीपतियों और उनके दलालों ने विकल्प रखा है कि या तो भूख और बेरोज़गारी से मरो, या फिर कोरोना से मरो! यह कोई विकल्प नहीं है और हमें भूख-बेरोज़गारी से मौत और कोरोना से मौत, दोनों से ही सुरक्षा का पूरा अधिकार है।
मोदी सरकार द्वारा विदेशों से अमीरों की औलादों, व्यापारी और मध्यवर्ग के धार्मिक श्रद्धालुओं को तो विशेष विमानों और एसी बसों से घर पहुँचाया गया, लेकिन मज़दूरों को मरने के लिए सड़क पर छोड़ दिया गया। याद रखिए! हम मज़दूरों ने ही इन धन्नासेठों की कोठियाँ बनायी हैं! हमने ही इनकी कारें और हवाई जहाज़ बनाये हैं! हमने सारी दुनिया ही बनायी है! लेकिन इस पूँजीवादी दुनिया में हमारा क्या है? कुछ नहीं! हमारा काम सिर्फ़ इतना है कि हम धन्नासेठों की तिजोरियाँ भरने, मालिकों का मुनाफ़ा बढ़ाने के लिए 12-12 घण्टे कमरतोड़ मेहनत करें। देश के केवल सरकारी गोदामों में उनकी क्षमता से तीन गुना अधिक, यानी साढ़े सात करोड़ मीट्रिक टन अनाज सड़ रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार केवल पिछले चार महीने में सरकारी गोदामों में 65 लाख मीट्रिक टन अनाज सड़ गया जिससे 18 करोड़ आबादी को पूरे लॉकडाउन के दौरान खाना खिलाया जा सकता था। उसे टाटा-बिड़ला-अम्बानी और धनी भूस्वामियों ने नहीं पैदा किया है, वह भी हमारे कमेरे हाथों ने पैदा किया है। फिर भी, कोरोना संकट के दौरान हमें भूखों मरने, हमारे बच्चों को भूख से तड़पने-बिलखने और सड़कों पर चलते-चलते मारे जाने के लिए छोड़ दिया गया! क्यों? सुई से लेकर जहाज़ तक बनाने के बावजूद हमारा उस पर कोई हक़ नहीं है। और जोंक की तरह हमारा ख़ून चूस रहे मालिकों, ठेकेदारों, दलालों के परजीवी वर्ग बिना कुछ किये ऐय्याशी कर रहे हैं। यह बात हम पहले भी जानते थे, लेकिन कोरोना महामारी के दौरान गहराये संकट ने इस सच्चाई को हमारे सामने पूरी तरह से बेपर्दा कर दिया है।
क्या आप पूँजी की इस उजरती ग़ुलामी को मंज़ूर करने के लिए तैयार हैं? क्या आप अपने बच्चों को अपनी आँखों के सामने बिलखता-तड़पता देखने को ही अपनी तक़दीर मान चुके हैं? क्या आप ऐसी जानवरों-सी ज़िन्दगी को चुपचाप जीने के लिए तैयार हैं? अगर हाँ, तो हमें आपसे कुछ नहीं कहना! लेकिन अगर आपका दिल भी इन हालात से बग़ावत कर रहा है, तो हमें निराशा को छोड़कर एक नयी शुरुआत करनी होगी। अपने अधिकारों के लिए संघर्ष की एक नयी शुरुआत! हमें पहले ख़ुद जागना होगा और फिर अपने सारे भाइयों, बहनों, साथियों को जगाना होगा। इसीलिए देशभर के मज़दूर मिलकर यह अभियान शुरू कर रहे हैं।
मालिकों-पूँजीपतियों की मुनाफ़ाख़ोरी के कारण आर्थिक संकट कोरोना महामारी के पहले से ही जारी था। कोरोना महामारी ने इस संकट को और ज़्यादा गहरा और गम्भीर बना दिया। लेकिन हमेशा की तरह छँटनी और तालाबन्दी करके,मज़दूरी रोककर, कोरोना महामारी में ज़बरन बिना सुरक्षा के काम करवाकर इस पूरे संकट की क़ीमत हम मज़दूरों से ही वसूली जा रही है। हम अगर घर जाना चाहते हैं, तो सरकार उसका कोई इन्तज़ाम नहीं कर रही है क्योंकि फिर मालिकों-ठेकेदारों को लेबर की कमी हो जायेगी और औसत मज़दूरी बढ़ेगी। नतीजतन, हममें से बहुत से भाई-बहन, उनके बच्चे सड़कों के रास्ते पैदल ही घर को निकल पड़े। उनमें से कई चलते-चलते, कई भूख से तो कई गाड़ियों से कुचलकर मारे गये। जो ट्रेनों में गये, उनमें से भी कई मारे गये या बीमार हो गये, क्योंकि मोदी सरकार जानबूझकर खाने और पानी के इन्तज़ाम के बिना ट्रेनों को कई दिनों तक ग़लत जगहों पर घुमाती रही। क्या ऐसी असंवेदनशील, अमानवीय और मज़दूर-विरोधी सरकार कोई हो सकती है? इस तरीक़े से भारत के मालिकान, ठेकेदार, दलाल और उनकी नुमाइन्दगी करने वाली मोदी सरकार अपनी मुनाफ़ाखोरी और फिर कोरोना महामारी को न सम्भाल पाने से गहराये संकट की क़ीमत हमसे वसूल कर रहे हैं और हम अपने ख़ून और जान से यह क़ीमत चुका रहे हैं। अब मोदी सरकार और कांग्रेस और भाजपा दोनों की ही राज्य सरकारें अध्यादेश लाकर हमें हमारे क़ानूनी श्रम अधिकारों से भी वंचित कर रही हैं। यह है मोदी सरकार का “रामराज्य”! आप अगर मज़दूर हैं, तो चाहे आप हिन्दू हों या मुसलमान या किसी और धर्म के, आपके लिए “रामराज्य”का मतलब है बिना चूँ-चपड़ किये 12-14 घण्टे कमरतोड़ मेहनत करना ताकि आपके मालिक और ठेकेदार की जेबें गर्म रह सकें!
लेकिन अब हम और बर्दाश्त नहीं करेंगे! हमारे सब्र का प्याला छलक रहा है। हमें भी एक इन्सानी ज़िन्दगी का हक़ है। हमें भूख, बेरोज़गारी, बेघरी, अशिक्षा, शोषण, दमन से मुक्ति चाहिए! हमें हमारे सभी श्रम अधिकार चाहिए! इस देश की सारी धन-दौलत हम पैदा करते हैं, टाटा-बिड़ला-अम्बानी जैसे पूँजीपति और मालिक-ठेकेदार नहीं। अगर ऐसा होता तो वे आज हमें घर वापस लौटने से रोकते नहीं, अपने कारख़ानों, भट्ठियों, खानों-खदानों और खेतों में ख़ुद ही दौलत पैदा कर लेते। इसलिए हमें भी आज अपना पाँव जमाकर खड़ा हो जाना चाहिए, साथियो। अगर नीचे दी गयी हमारी माँगे पूरी नहीं की गयीं, तो हम सड़कों पर उतरेंगे, आन्दोलन करेंगे और अपने इन हक़ों को लेकर रहेंगे।
हमारी माँगें :
1) कोविड-19 से गहराये आर्थिक संकट की आड़ में मज़दूरों से ग़ुलामों के समान 12-12 घण्टे काम कराने, हड़ताल का अधिकार ख़त्म करने, यूनियन बनाने का अधिकार ख़त्म करने आदि के लिए श्रम क़ानूनों में किये जा रहे संशोधनों को तत्काल रद्द करो!
2) सभी मज़दूरों-मेहनतकशों को एपीएल-बीपीएल राशनकार्ड के बिना राशन की दुकानों से अनाज मुहैया कराओ!
3) कोरोना संक्रमण के ख़तरे के टलने तक मज़दूरों-मेहनतकशों को काम करने के लिए क़तई मजबूर न किया जाये! लॉकडाउन को ख़त्म करने के नाम पर मज़दूरों को कोरोना संक्रमण के जोखिम में डालना बन्द करो। उन्हें मज़दूरी सहित अवकाश व रोज़गार की पूर्ण सुरक्षा दो! कोरोना संकट के दौरान मज़दूरों की छँटनी तत्काल बन्द की जाये।
4) तथाकथित ‘स्वरोज़गार प्राप्त’ अनौपचारिक मज़दूरों जैसे ठेला चालक, रिक्शा चालक, रेहड़ी-खोमचे वालों, आदि के लिए 15,000 रुपये प्रति माह नक़द गुज़ारे भत्ते की व्यवस्था करो, उनकी नियमित व नि:शुल्क कोरोना जाँच की व्यवस्था करो, उन्हें आवश्यक सुरक्षा प्रदान करो!
5) घर जाने वाले प्रवासी मज़दूरों के लिए पूर्ण सुरक्षा के साथ नि:शुल्क परिवहन की व्यवस्था करो! अब तक प्रवासी मज़दूरों के लिए परिवहन की व्यवस्था में की गयी आपराधिक लापरवाही के लिए ज़िम्मेदार रेल मंत्री व अन्य अधिकारियों के ख़िलाफ़ दण्डात्मक कार्रवाई करो!
6) स्वास्थ्य सेवा समेत सभी मूलभूत सेवाओं व वस्तुओं के उत्पादन, जैसे परिवहन, बिजली उत्पादन व वितरण, आदि में लगे मज़दूरों व कर्मचारियों और साथ ही आम पुलिसकर्मियों को सुरक्षा के सभी आवश्यक उपकरण प्रदान करो, उनकी नियमित कोरोना जाँच व नि:शुल्क इलाज की व्यवस्था की जाये!
7) सभी मूलभूत वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति की सार्वभौमिक सार्वजनिक व्यवस्था करो!
8) सरकारी योजनाविहीनता के कारण लॉकडाउन के दौरान सड़कों पर और श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेनों में मरने वाले सभी मज़दूरों के परिवारों के एक-एक सदस्य को पक्की नौकरी और उचित मुआवज़ा प्रदान करो!
9) कोरोना संकट से निपटने के संसाधनों के लिए देश के पूँजीपतियों और अमीर वर्गों पर विशेष टैक्स और सेस लगाओ।
10) गुणवत्ता वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा का निर्माण किया जाये, व्यापक पैमाने पर सरकारी अस्पतालों, स्वास्थ्य केन्द्रों व विशेष एपिडेमिक कण्ट्रोल सेण्टरों की स्थपना करो। इसके लिए भारत के पास पर्याप्त मानव संसाधन हैं, यानी पर्याप्त संख्या में डॉक्टर, नर्स, व अन्य मेडिकल प्रशिक्षित कार्यशक्ति है, जिन्हें इसी के ज़रिये रोज़गार भी प्राप्त होगा। हर नागरिक को सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल का अधिकार मुहैया कराया जाये।
11) सभी निजी अस्पतालों, नर्सिंग होमों व पैथोलॉजी लैब का राष्ट्रीकरण किया जाये। कोरोना की नि:शुल्क जाँच और इलाज में आनाकानी करने वाले अस्पतालों और लैब के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाये। कोरोना संकट के चलते अन्य बीमारियों के इलाज के लिए बन्द किये गये ओपीडी आदि को तत्काल खोला जाये।
12) किरायाखोर मकानमालिक वर्ग को महामारी के जारी रहते किराया न लेने के लिए बाध्य करो। यदि कहीं विशेष स्थिति हो, तो वह किराया सरकार की ओर से दिया जाये।
13) कोरोना महामारी के दौरान 18 करोड़ बेघर भारतीय नागरिकों और 18 करोड़ झुग्गियों में रहने वाले भारतीय नागरिकों के पक्के आवास की व्यवस्था के लिए सभी ख़ाली सरकारी व निजी मकानों को अधिग्रहीत किया जाये और सरकार की ओर से आवास की सार्वजनिक व्यवस्था की जाये।
14) सीएए-एनआरसी जैसी जनविरोधी योजना को रद्द कर एनपीआर-एनआरसी के लिए आवण्टित पूरे फण्ड को कोरोना संकट से निपटने के काम में लगाया जाये।
15) पीएम केयर फण्ड का सार्वजनिक ऑडिट करवाया जाये और उसमें जमा हज़ारों करोड़ रुपये को जनकमेटियों की निगरानी में कोरोना संकट से निपटने के लिए उपयोग किया जाये।
16) कोरोना संकट के दौरान प्रवासी मज़दूरों व अन्य मज़दूरों पर पुलिसिया दमन और अत्याचार पर लगाम लगाने के लिए सख़्त क़दम उठाये जायें और दोषी पुलिसकर्मियों को तत्काल दण्डित किया जाये।
17) कोरोना संकट के दौरान देशभर में जनता के लिए आवाज़ उठाने वाले सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों की गिरफ़्तारी और दमन पर रोक लगाओ और सभी राजनीतिक बन्दियों को तत्काल रिहा करो।
18) नियमित प्रकृति के कामों के लिए ठेका, अस्थायी व कैजुअल मज़दूरी करवाने पर तत्काल रोक लगायी जाये और ‘निर्धारित अवधि के रोज़गार’ (फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेण्ट) को बन्द किया जाये।
19) कोरोना संकट की आड़ में श्रम विभाग में लम्बित मसलों को लटकाया न जाये और उनका जल्द से जल्द निपटारा किया जाये।
20) पी.एफ. से धन निकासी की प्रक्रिया को आसान बनाया जाये और इसमें निहित तमाम बाधाओं को समाप्त किया जाये, ताकि मैनेजमेण्ट, मालिकान या ठेकेदारों द्वारा कमीशनखोरी व घोटालेबाज़ी पर रोक लगायी जा सके।
21) राज्य सरकारें अभी तक केवल भवन निर्माण मज़दूरों के लिए पहचान कार्ड बनाती हैं। इस प्रावधान को कारख़ाना मज़दूरों पर भी लागू किया जाये, क्योंकि अनौपचारिक व असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के पास आम तौर पर मज़दूर के तौर पर पहचान का कोई प्रमाण नहीं होता।
22) भारत के भारी-भरकम रक्षा बजट को कम से कम करके कोरोना संकट से निपटने पर ख़र्च किया जाये।
साथियो! जीना है, तो लड़ना होगा! अपने अधिकार के लिए, सम्मान के लिए, अपने बच्चों के लिए! इस लड़ाई की शुरुआत मज़दूर संघर्ष संकल्प अभियान के साथ की गयी है। इसमें शामिल हों! इसके बारे में अपने दोस्तों, साथियों और परिवार वालों को बतायें। औरों को इससे जोड़ें। ये हमारे अस्तित्व का सवाल है। अगर हम लड़ते नहीं, तो ये मालिक-ठेकेदार हमारे ख़ून की आख़िरी बूँद को भी सिक्कों में ढालने से बाज़ नहीं आयेंगे। अभियान से जुड़ने के लिए नीचे दिये गये नम्बरों पर फ़ोन करें।
बिन हवा न पत्ता हिलता है! बिन लड़े न कुछ भी मिलता है!
मज़दूरों ने ठान लिया है! हक़ लेना है जान लिया है!
- भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (RWPI)
सहयोगी यूनियनें व संगठन: दिल्ली मज़दूर यूनियन, दिल्ली स्टेट आँगनवाड़ी वर्कर्स एण्ड हेल्पर्स यूनियन, दिल्ली घरेलू कामगार यूनियन, दिल्ली इस्पात उद्योग मज़दूर यूनियन, बवाना औद्योगिक क्षेत्र मज़दूर यूनियन, दिल्ली मेट्रो रेल कॉण्ट्रैक्ट वर्कर्स यूनियन, ऑटोमोबाइल इण्डस्ट्री कॉण्ट्रैक्ट वर्कर्स यूनियन, करावलनगर मज़दूर यूनियन, क्रान्तिकारी मनरेगा मज़दूर यूनियन (हरियाणा), निर्माण मज़दूर यूनियन (हरियाणा), बांधकाम कामगार संघर्ष समिति (महाराष्ट्र), आंबिलओढा पूरग्रस्त नागरिक संघर्ष समिति (पुणे, महाराष्ट्र),छत्तीसगढ़ माइन्स श्रमिक संघ (दल्ली राजहरा), छत्तीसगढ़ श्रमिक संघ (शहीदनगर, बीरगाँव),बिगुल मज़दूर दस्ता, नौजवान भारत सभा, स्त्री मज़दूर संगठन
सम्पर्क सूत्र : 9873358124, 9871771292, 9289498250, 8860743921 (दिल्ली), 8685030984, 8010156365, 9068886606 (हरियाणा), 8115491369, 9971196111, 9599067749 (उत्तर प्रदेश), 7070571498, 8873079266 (बिहार), 7042740669 (उत्तराखण्ड), 6283170388 (पंजाब), 8956840785, 7798364729, 8888350333, 9082861727 (महाराष्ट्र), 8089714315, 7907765374 (केरल) , 9582712837 (हिमाचल प्रदेश), 9989170226 (तेलंगाना), 9993233537, 9993233527 (छत्तीसगढ़), 7631235116 (पश्चिम बंगाल)